धूम्रपान न करने वालों को फेफड़ों का कैंसर क्यों होता है?

धूम्रपान न करने वालों को फेफड़ों का कैंसर क्यों होता है?

अक्सर यह माना जाता है कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ धूम्रपान करने वालों को ही होता है, लेकिन मेडिकल रिसर्च और क्लिनिकल अनुभव बताते हैं कि बड़ी संख्या में ऐसे मरीज भी सामने आ रहे हैं जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया। ऐसे मामलों में मरीज और उनके परिवार यह सवाल जरूर पूछते हैं| “जब मैंने कभी धूम्रपान ही नहीं किया, तो मुझे फेफड़ों का कैंसर कैसे हो गया?”

 

इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों का कैंसर क्यों होता है, इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, और समय पर जांच व सही इलाज क्यों बेहद जरूरी है।

धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख कारण

 

1. सेकेंड-हैंड स्मोक (Passive Smoking)

 

जो लोग खुद धूम्रपान नहीं करते लेकिन लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहते हैं, वे भी जोखिम में होते हैं। घर, ऑफिस या सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट के धुएँ को बार-बार सांस के साथ अंदर लेना फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है।

 

2. वायु प्रदूषण (Air Pollution)

 

भारत जैसे देशों में बढ़ता एयर पॉल्यूशन फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण बन रहा है। वाहनों का धुआँ, फैक्ट्री से निकलने वाली गैसें और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में जाकर लंबे समय में कैंसर का कारण बन सकते हैं | खासतौर पर उन लोगों में जो शहरों में रहते हैं।

 

3. रैडॉन गैस का प्रभाव

 

रैडॉन एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है जो जमीन से निकलकर बंद जगहों, जैसे घरों या बेसमेंट, में जमा हो सकती है। लंबे समय तक रैडॉन के संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ता है, भले ही व्यक्ति ने कभी धूम्रपान न किया हो।

 

4. जेनेटिक कारण (Genetic Factors)

 

कुछ लोगों में फेफड़ों के कैंसर की पारिवारिक प्रवृत्ति होती है। यदि परिवार में किसी को पहले फेफड़ों का कैंसर रहा है, तो बिना धूम्रपान किए भी जोखिम बढ़ सकता है। कई बार यह खास जेनेटिक म्यूटेशन (जैसे EGFR mutation) के कारण होता है, जो नॉन-स्मोकर्स में अधिक देखा जाता है।

 

5. पेशे से जुड़ा जोखिम (Occupational Exposure)

 

कुछ पेशों में काम करने वाले लोग, जैसे कंस्ट्रक्शन, माइनिंग, फैक्ट्री वर्कर्स, एस्बेस्टस, केमिकल्स या जहरीली गैसों के संपर्क में आते हैं। ये तत्व लंबे समय में फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाकर कैंसर का कारण बन सकते हैं।

 

6. पहले से मौजूद फेफड़ों की बीमारियाँ

 

टीबी, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस या फेफड़ों की पुरानी सूजन जैसी बीमारियाँ भी भविष्य में फेफड़ों के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती हैं, भले ही व्यक्ति धूम्रपान न करता हो।

 

धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के लक्षण है: 

 

  • लगातार खांसी या खांसी में खून

  • सांस फूलना

  • सीने में दर्द

  • बार-बार संक्रमण होना

  • अचानक वजन कम होना

  • थकान और कमजोरी

 

इन लक्षणों को अक्सर लोग हल्के में ले लेते हैं, जिससे बीमारी देर से पकड़ में आती है।

 

समय पर जांच और सही इलाज क्यों जरूरी है?

 

धूम्रपान न करने वालों में होने वाला फेफड़ों का कैंसर अक्सर शुरुआती स्टेज में पहचान में नहीं आ पाता, क्योंकि लोग खुद को “लो-रिस्क” मान लेते हैं। लेकिन अगर समय रहते CT scan, PET scan और बायोप्सी जैसी जांच करवाई जाए, तो इलाज के बेहतर विकल्प उपलब्ध होते हैं | जैसे टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और आधुनिक कीमोथेरेपी।

 

सही डॉक्टर का चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?

 

फेफड़ों का कैंसर एक जटिल बीमारी है, जिसका इलाज हर मरीज में अलग-अलग हो सकता है। इसलिए अनुभवी और अपडेटेड ऑन्कोलॉजिस्ट से इलाज कराना बेहद जरूरी है।

 

यदि आप या आपके परिवार में कोई इस समस्या से जूझ रहा है, तो best medical oncologist in Gurgaon से परामर्श लेना सही दिशा में पहला कदम हो सकता है, ताकि बीमारी की सटीक स्टेजिंग और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान बनाया जा सके।

 

निष्कर्ष

फेफड़ों का कैंसर सिर्फ धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है। वायु प्रदूषण, जेनेटिक कारण, सेकेंड-हैंड स्मोक और पर्यावरणीय जोखिम जैसे कई कारणों से धूम्रपान न करने वालों में भी यह बीमारी हो सकती है। सबसे जरूरी बात है कि लक्षणों को नजरअंदाज न करना, समय पर जांच करवाना और अनुभवी मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट से सही इलाज लेना।

यदि आपको लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द, वजन कम होना या बार-बार इंफेक्शन जैसी समस्या हो रही है, तो इसे सामान्य न समझें। तुरंत अनुभवी मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट से परामर्श लें।

डॉ. पूजा बब्बर (Dr. Pooja Babbar), 15+ वर्षों के अनुभव के साथ, फेफड़ों के कैंसर की आधुनिक जांच और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट में विशेषज्ञ हैं। उनकी देखरेख में सही स्टेजिंग, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी के माध्यम से मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

 

Best Medical Oncologist in Gurgaon से समय पर सलाह लेना जीवन रक्षक साबित हो सकता है।

 

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